रो दूं तो सही
कोई आंसू पोंछने वाला तो हो
बिखर जाऊं तो सही
कोई समेटने वाला तो हो
बात अपनी कह दूं तो सही
कोई समझने वाला तो हो
खामोश भी रह जाऊं तो सही
कोई खामोशी पढ़ने वाला तो हो
मगर कोई ना आया
मेरे आंसू पोंछने
मेरे टुकड़े समेटने
मेरी खामोशी पढ़ने
क्योंकि ना वक्त है लोगों के पास
और ना ही है सब्र
सो मैं यूं ही चलती रही
मुखौटा मुस्कान का लिए
रो दूं तो सही
कोई आंसू पोंछने वाला तो हो
बिखर जाऊं तो सही
कोई समेटने वाला तो हो
कोई समेटने वाला तो हो…

Leave a comment