एक वक्त वो भी था…

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एक वक्त वो भी था
जब चाहा था मैंने कि लोग जश्न मनाएं
मेरे होने का
महज़ मौजूदगी का
और एक वक्त आज का है
कि खुश हूं मैं कि वो भूल गए
जैसे एक इत्मीनान-सा है
कि उनका भूल जाना
मेरे लिए उनके प्यार में
कमतरी नहीं है
वो बस‌ है भूल जाना
एक तारीख का
शायद अब मैं सच में बड़ी हो गई हूं
बदल दिए हैं तराज़ू मैंने
रिश्तों को तोलने के
या शायद
मैं उससे भी आगे बढ़ गई हूं
और फेंक दिए हैं
मैंने सब तराज़ू
क्योंकि प्यार को भी क्या तोला जा सकता है कभी
एक वक्त वो भी था
और एक वक्त आज का है…

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