एक कमरे के कोने में पड़ा कैनवस
पुकार रहा था मुझे
कुछ यूं लग रहा था
जैसे इल्तिज़ा कर रहा हो
कि छू लो मुझे
उस मुलायम ब्रश के होंठ से
और बना डालो एक तस्वीर
जो हर वो बात कह दे
जो लफ्ज़ कभी कह न पाए
जो हर वो नगमा गुनगुनाए
जो किसी को तुम सुना न पाए
बना डालो तुम वो तस्वीर
जो एक झलक में
तुम्हारे हर जज़्बात से
एक पर्दा-सा गिरा जाए
एक कमरे के कोने में पड़ा कैनवस
पुकार रहा था मुझे
कुछ यूं लग रहा था
जैसे इलतीजा कर रहा हो…

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